Author name: AkshiniBhatnagar

तुम हो तो हम हैं..

तुम हो तो हम हैं.. तुम नहीं तो कुछ नहीं,तुम हो तो हम हैं.. तेरी सुरत को तरसे मेरा मन,तेरी सीरत को मचले आँगन.. तुम्हें याद करती हैंकरवटों की सलवटें.सुनना चाहती हैं,तेरे कदमों की आहटें. जो तुम हो तो हर खुशी है,तुम से ही ये ज़िंदगी है.. तेरे बगैर चुभता है,सलोना बिछौनातेरी राह तकता हैकोना […]

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तीन साल..

तीन साल.. आज पूरे हो गए हैं तीन साल..शुभकामनाएं करें स्वीकार.. बेबाक रहे मोदी जी आप,बेदाग रही आपकी सरकार.. दुश्मन को हमने दहलाया ख़ूब,घावों को सबके सहलाया ख़ूब.. ‘उज्जवला’ से चमक रहे गाँव,‘डिमो’ का भी अच्छा चला दाँव.. खुल गए हैं सबके खाते,‘जनधन’ सब बीमा करवाते.. पारदर्शी रही अपनी सरकार ,समदर्शी था जिसका व्यवहार.. काबू

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तम्मा-तम्मा

तम्मा-तम्मा हाथी और झाड़ू संवारते रहे अपने अरमां,पप्पु और टीपू जलाते रहे अपनी शम्मा, उधर नाची ऐसी वो छम्मा-छम्माऔर चिनम्मा बन गई नयी अम्मा पनीर सेल्वम् निकले उसके भी अब्बा,लो अब कर लो तुम तम्मा-तम्मा.. अक्षिणी भटनागर

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छोटा सा सवाल..

छोटा सा सवाल.. मरता क्या न करता बेचारा,डूबते को बस तिनके का सहारा.. सौ साल पुरानी पार्टी का हाल बड़ा बेहाल,सत्ता से हुए दूर तो लड़खड़ा गई चाल.. छटपटाहट है इनकी देखने वाली,कैसे फंसे फिर जनता भोली भाली.. कहीं कुछ ना मिला तो बातों का बिछाया जाल,आतंकियों की आधी रोटी में मिला रहे दाल.. इसके

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चुक गए हैं आप..

चुक गए हैं आप.. खुशियां मनाएं..प्रशस्ति तो बनती ही है..आजादी का खूब उठाया आपने लाभ,देशद्रोहियों से खूब मिलाया आपने हाथ..शीर चाय पे कर आए उनसे मुलाकात,हुर्रियत के हुर्रों से कर आए दिल की बात.. कृपया बताएं..एक जांच तो बनती ही है..ये विचार कहाँ से आया,आपने अपना ख़ब्ती दिमाग लगाया?या था सोनिया माई ने सुझाया,आपके कंधों

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चीफ मिनिस्टरन के बिटवा

चीफ मिनिस्टरन के बिटवा पप्पु टीपू से आगे बढ़ीं,तनी बिहार का रूख करीं.जिहाँ लालू के ललवादिखावत आपन जलवाइ हैं दुई दुई CM के बचवा,आपन बायो मा बतावत सबका,डिप्टी सीएम इहे न बतावत बानी ,कितना पचाय लिए हैं भैंसिया के चरवा. अक्षिणी भटनागर

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चलते चलते..

चलते चलते.. चलते – चलते, रुकते – थमते,झुकते – चुकते, बनते – ठनते,शब्दों के ताने जुड़ जाएंऔर कविता बन जाए.. कड़वी नीम निंबोरी को..मीठी आम अमोरी को..चख पाएं तो कह पाएं..और कविता बन जाए.. गहरी रात अंधेरी हो,डसती पीर घनेरी हो,सह जाएं तो कह पाएं..और कविता बन जाए.. मन कविता सरिता में बह जाए,और रचिता

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घर द्वार देखो..

घर द्वार देखो.. सुनो मेरी चाचियों सुनों मेरी ताईयों,सुनो मेरी बहनों सुनो भौजाईयों.ज़रा अपनी सूती साड़ियां ऊपर रखो,कोई रेशमी  अच्छी साड़ियां पहन लो. सुनो मेरी…थोड़ा अपना चौका बासन देख लो,थोड़ा अपना घर द्वार बुहार लो.बहुत हो गए चुनाव दौरे,अब फुरसत ही फुरसत है. सुनो मेरी..जो हार गए तो आराम हैपांच बरस कोई हुज्जत नहीं..जीते तो

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खुरचन..

खुरचन.. इंतिहा जवाब तो आए थे,सवालों को भाए नहीं.इंकलाब भी लाए थे, तुम हम समझ पाए नहीं.. है यकीं अगर तो उसे रिहा कर दो,वो न सही तुम ये वादा वफा कर दो.. यादों–वादों का इतना ही फसाना है,ये जो आएं तो सुकूं छिन जाना है.इंतिहां मुसीबत का सामां है येहमने इन्हें गले ना लगाना है.. छोड़ो भी अब,काहे बैठे हो जमाने को भुलाए..जाने न मुहब्बत वो,माने ना जो तुम्हारे मनाए.. अक्षिणी भटनागर

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क्यों..?

क्यों..? अभूतपूर्व दृश्य है कपोल कल्पना काएक च्यूइंग-गम छाप निर्देशकऔर उनके खयालों में बसा आततायी,जिसके सपनों में दिखे प्रीत के क्षण,सदियों से जो था लूटेरावो कर रहा आलिँगन,आलिँगन भी किससे?जिसके सतीत्व का साक्षीरहा स्वयं समय..सृजन की स्वतंत्रता है येया उच्छृंखलता?या दुस्साहस..?और क्यों..? अक्षिणी भटनागर

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